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मकर संक्रांति से जुड़ी कुछ खास अनसुनी अनजानी बातें

मकर संक्रांति भारत का एक मात्र ऐसा त्यौहार है, जिसे भारत के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है । आज हम आपको बताते हैं इस त्यौहार से जुड़े कुछ रोचक -

‘मकर संक्रांति’ का यह त्यौहार हर साल जनवरी के महीने में 14वे या 15वे दिन आता है । इस दिन सूरज धनु राशि को छोड़ मकर राशि में जाता है, इसलिए भी इस त्यौहार को मकर संक्रांति कहा जाता है । यह भारत का ऐसा एक मात्र त्यौहार है जिसका हर अलग प्रदेश में अलग नाम है और इस त्यौहार को हर प्रदेश में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है । ‘मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र’ में तो इस त्यौहार को ‘मकरसंक्रांति’ या ‘संक्रांत’ के नाम से ही जानते हैं, लेकिन कुछ प्रदेश ऐसे भी हैं जहाँ इन्हें अलग नाम से भी जाना जाता है । तो आइये जानते हैं की इस त्यौहार को किस प्रदेश में किस तरह से मनाया जाता है ।

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना

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मकर संक्रांति को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 4 दिन तक मनाया जाता है -

पहला दिन - इस त्यौहार के पहले दिन को 'भोगी' कहा जाता है । इस दिन वहाँ के लोग घर का पुराना सामान बेच कर या बाहर फेक कर बाजार से नया सामान ले कर आते हैं, शाम ढ़लते ही लोग घर के बाहर आग जला कर उसमे घर का पुराना सामान डालते हैं । इस आग को यह लोग 'ज्ञान की अग्नि' भी कहते हैं जिसके सामने खड़े होकर भगवान शिव का स्मरण किया जाता है । 

दूसरा दिन - दूसरे दिन इस त्यौहार का मुख्य दिन होता है, इस दिन वहाँ के लोग अपने परिवार के साथ नए कपड़े पहन कर, घर में बनाई हुई मिठाइयों का आनंद लेते हैं । घर की महिलायें इस दिन घर के बाहर रंगोली बनती हैं जिसे वहाँ के लोग उनकी भाषा में 'मुग्गु' कहते हैं ।

तीसरा दिन - इस त्यौहार के तीसरे दिन को 'कनुमा' कहा जाता है । इस दिन वहाँ के लोग अपने पालतू और आस पास के पशुओं को उनके हिसाब का आहार खिलाते हैं ।

चौथा दिन - इस त्यौहार के चौथे और आखरी दिन को 'मक्कानुमा' कहा जाता है । इस दिन वहाँ के लोग अपना ज़्यादातर समय अपने परिवार के साथ ही बिताते हैं और कुछ मनोरंजक गतिविधि भी करते हैं, जैसे बैलों की दौड़, पतंगबाज़ी और मुर्गों की लड़ाई भी करवाते है । 

पोंगल, तमिलनाडु

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आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की तरह तमिलनाडु में भी इस त्यौहार को बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है । इस त्यौहार को वहाँ 'पोंगल' के नाम से जाता है, इस त्यौहार को भी वहाँ के लोग चार दिन तक मनाते हैं ।

पहला दिन - इस त्यौहार के पहले दिन को 'भोगी पांडीगई' कहते हैं । इस दिन यह लोग घर के बाहर आग जलाकर उसमे घर की पुरानी चीज़ें डालते हैं । इस दिन घर की छतों को नीम के पत्तों से ढक दिया जाता है और दीवालों पर भी नीम के पत्ते लगा दिए जाते हैं, इस रिवाज़ को तमिल भाषा में 'कप्पू कट्टु' कहा जाता है ।

दूसरा दिन - दूसरा दिन पोंगल त्यौहार का मुख्य दिन होता है जिसे पोंगल या (थाई पोंगल) भी कहा जाता है । इस दिन यह लोग एक पतीले में चावल, दूध, चीनी (शक्कर), किशमिश और काजू, बादाम डाल कर उबालते हैं, जैसे ही पतीले में उबाल का पहला गुब्बारा बनता है सब लोग साथ मिल कर ज़ोर-ज़ोर से 'पोंगालो पोंगल' चिल्लाने लगते हैं ।

तीसरा दिन - त्यौहार के तीसरे दिन को 'मट्टू पोंगल' बोला जाता है । इस दिन यहाँ के लोग 'गाय-बैलों' को उनके हिसाब का खाना खिलाते हैं।

चौथा दिन - चौथे दिन को 'कन्नुम पोंगल' कहा जाता है । इस दिन यह लोग अपना सारा समय अपने परिवार के साथ गुजारते हैं ।        

पौष पर्बों, पश्चिम बंगाल

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इस त्यौहार को पश्चिम बंगाल में 'पौष पर्बों' कहा जाता है । बंगाल की मिठाईयाँ बहुत स्वादिष्ट होती हैं और पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। बंगाल में इस त्यौहार के उपलक्ष्य में पुली पीठे, पातिस्प्ता, माल पुआ, नर्केल नाडू जैसी खास मिठाइयाँ बनाई जाती हैं । इस दिन वहाँ के लोग माँ गंगा और भगवान शिव की आराधना करते हैं ।    

लोहड़ी, पंजाब

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मकर संक्रांति के इस त्यौहार को वहाँ के लोग 'लोहड़ी' के नाम से मनाते हैं । लोहड़ी को हर साल जनवरी की 13 तारीख़ को मनाया जाता है । गन्ने की फसल कटने की ख़ुशी में इस त्यौहार को मनाया जाता है । रात में वहाँ के लोग एक साथ इकठ्ठा होकर आग के चक्कर लगते हुए इस त्यौहार को मनाते हैं, लोहड़ी का जश्न पंजाब में देखने लायक होता है, वहाँ के लोग इस त्यौहार को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं ।      

उत्तरायण, गुजरात

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मकर संक्रांति के पर्व को गुजरात प्रदेश में 'उत्तरायण' नाम से मनाया जाता है, इस त्यौहार को वहाँ के लोग 2 दिन मनाते हैं।

पहला दिन - 14 जनवरी को इस त्यौहार का पहला दिन मनाया जाता है, जिसे 'उत्तरायण' कहा जाता है । इस त्यौहार को गुजरात के लोग पतंग उड़ा कर मनाते हैं । एक दूसरे की पतंग को हवा में काटने की प्रतियोगिता भी रखी जाती है । पतंग काटने के बाद यह लोग ख़ुशी में जोर जोर से 'काई पो छे' चिल्लाते हैं ।

दूसरा दिन - इस त्यौहार के दूसरे दिन को 'वासी' कहते हैं । इस दिन वहाँ के लोग अपने प्रदेश के प्राचीन व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हैं जैसे चिक्की, उन्धीयु आदि।    

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