fbpx
व्यू पॉइंट

2018 Rewind: सुप्रीम कोर्ट के इन ऐसिहासिक फैसलों से मिली मजबूती और खुल कर जीने की आजादी

देश में चल रहे राजनैतिक और आर्थिक गतिरोध के चलते देश में घटित कई घटनाओ ने ध्यान खींच लेकिन इस साल कुछ ऐसे जजमेंट भी हुए जो देश के नागरिको के अधिकारों और मानवता को ध्यान में रखकर लिए गए और दशकों से लटके इन मुद्दे पर गेहेराई से विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसले इस वर्ष सुनाए जिसमे कुछ बड़े फैसलों ने देश में औरते के हक़ और अधिकार को मजबूती दी।

कुछ निर्णयों पर सर्वसम्मति से स्वागत किया गया है। कुछ की आलोचना भी हुई है (क्योकि फैसले से उनके एहम पर असर पड़ रहा था)। दिलचस्प बात यह है कि कुछ निर्णय का स्वागत उन लोगो ने भी किया जो अक्सर देश और देश की न्याय प्रणाली की आलोचना करते हैं। यह एक स्पष्ट संकेत है कि अदालत ने बिना किसी का पक्ष लेते हुए सभी फैसले सुनाए।

देर आये लेकिन दुरुस्त आये, ये ऐसे मुक़दमे थे जो कई स्तर पर हर किसी के लिए मायने रखते है और निश्चित ही एक बेहतरीन भविष्य की नींव रखने के लिए लिए गए है।

धारा 377, सभी को प्यार करने का बराबर का हक़

इस ऐतिहासिक निर्णय की हर तरफ प्रशंसा हुई और सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सभी ने स्वागत किया , 6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 पर निर्णय सुनाते हुए समलैंगिकता को वैध कर दिया। समलैंगिकता को वैध करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय जजों की बेच ने LGBTQ कम्युनिटी के मन में भारतीय न्यायलय प्रणाली के प्रति निष्ठा और भी ज्यादा बड़ा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377  पर फैसला देते हुए ये भी कहा कि कोई भी दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से समलैंगिक सम्बन्ध बनाने पर “उन्हें अपराधी के रूप में नहीं देखा जाएगा”

आधार की वैधता, अब से नहीं हर चीज़ के लिए जरुरी 

सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर, 2018 को आधार की वैधता को बरकरार रखते हुए, आधार से जुडी अधिनियम की धारा 57 में बदलाब करते हुए फैसला सुनाया। जिसमे ये कहा गया कि निजी कंपनियां आधार नहीं मांग सकती हैं साथ ही बैंक खातों, सिम खरीदने के लिए भी आधार अनिवार्य नहीं होगा।

व्यभिचार(Adultery),पुरुषो की बेड़ियों से आजादी

एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने देश में व्यभिचार(शादी के बाद किसी और से सम्बन्ध ) को जुर्म की श्रेणी से हटा दिया। कोर्ट ने धारा 497 को अंडरलाइन करते हुए बयान दिया कि इस धारा की वजह से औरतो को अपने पति की प्रॉपर्टी समझा जाता है इसलिए यह स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है। इसने केंद्र सरकार की रक्षा निति धारा 497 को ख़तम कर दिया जिसके अनुसार ये विवाह की पवित्रता की रक्षा करती है।

सबरीमाला का फैसला,सदियों पुरानी प्रथा की समाप्ति

सुप्रीम कोर्ट ने  केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 वर्ष से 50 वर्ष की महिलाएँ के प्रवेश वर्जित पर सदियों पुरानी प्रथा को समाप्त कर दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, “सबरीमाला मंदिर में प्रवेश वर्जित होना हिंदू महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है। इसे संविधान के अनुरूप होना चाहिए”। इसे महिलाए के पक्ष में लिए गए कई बड़े फैसलों में से एक माना जा रहा है क्योकि महिलाओं को दबाने वाली प्रथाओं को समाप्त करते हुए ये उनके उत्थान के लिए लिया गया एक अहम फैसला है जो निश्चित तौर पर एक बेहतरीन शुरुवात है।

ट्रिपल तालाक

22 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद इस्लामी नियम “ट्रिपल तलाक” को मनमाने ढंग से और असंवैधानिक रूप से इस्तेमाल पर प्रतिबंधित लगा दिया , इस ऐतिहासिक फैसले को सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा की कोई भी मुस्लिम पुरुष किसी भी मुस्लिम महिला को सिर्फ तलाक कहकर डाइवोर्स नहीं दे सकता है न ही वो किसी ईमेल, व्हाट्सएप या लिखित तरीके से। शीर्ष अदालत ने कहा कि ट्रिपल तालाक मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है क्योंकि यह बिना किसी समझौते के विवाह को समाप्त कर देता है।

पोस्को एक्ट संशोधन, बच्ची से रेप पर सजा-ए-मौत

बच्चियों के साथ बढ़ती रैप की घटनओं को रोकने के लिए इस वर्ष मोदी सरकार ने पोस्को एक्ट में संशोधन किया जिसमे 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ रैप करने पर मुजरिम को मौत की सजा दी जाएगी। मोदी सरकार की यूनियन कैबिनेट ने इसमें संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी दी जिसके बाद नियम सीधे प्रभाव् में आ गया।

विज्ञापन