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जिसके हम मामा है : चुनावी माहौल के लिए शरद जोशी का ये व्यंग समझ लेना ही समझदारी

चुनावी माहौल के लिए शरद जोशी का ये व्यंग

देश में तो वैसे भी चुनावी माहौल पूरी साल बना रहता है लेकिन प्रदेश में चुनाव का माहौल बनाना शुरू हो गया है ऐसे में खुद को 5 साल के लिए त्रासद कर लेने से अच्छा है कि हम चुनावी जुमलों से सतर्क हो जाए। ऐसे ही एक चुनावी जुमले का जिक्र शरद जोशी ने अपनी कृति “जादू की सरकार” में कई साल पहले किया था।

दुर्भाग्यवश पोलिटिकल पार्टी अभी भी अपडेट नहीं हुई इसलिए आज भी ये कृति वर्तमान चुनावी माहौल पर परफेक्ट बैठती है। ये पड़ी तो आप ने बचपन में भी होगी, अपनी स्कूल की किताब में , लेकिन समझ में आज आएगी।


एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आता।

‘‘मामाजी ! मामाजी !”-लड़के ने लपक कर चरण छूए।

वे पहचाते नहीं। बोले-‘‘तुम कौन ?”

‘‘मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे ?”

‘‘मुन्ना ?” वे सोचने लगे।

‘‘हाँ, मुन्ना। भूल गये आप मामाजी ! खैर, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गये।”
‘‘तुम यहां कैसे ?”

‘‘मैं आजकल यहीं हूँ।”

‘‘अच्छा।”

‘‘हां।”

मामाजी अपने भानजे के साथ बनारस घूमने लगे। चलो, कोई साथ तो मिला। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर। फिर पहुँचे गंगाघाट। सोचा, नहा लें।

‘‘मुन्ना, नहा लें ?”

‘‘जरूर नहाइए मामाजी ! बनारस आये हैं और नहाएंगे नहीं, यह कैसे हो सकता है ?”
मामाजी ने गंगा में डुबकी लगाई। हर-हर गंगे।

बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब ! लड़का…मुन्ना भी गायब !
‘‘मुन्ना…ए मुन्ना !”

मगर मुन्ना वहां हो तो मिले। वे तौलिया लपेट कर खड़े हैं।

‘‘क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है ?”

‘‘कौन मुन्ना ?”

‘‘वही जिसके हम मामा हैं।”

‘‘मैं समझा नहीं।”

‘‘अरे, हम जिसके मामा हैं वो मुन्ना।”

वे तौलिया लपेटे यहां से वहां दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला।

भारतीय नागरिक और भारतीय वोटर के नाते हमारी यही स्थिति है  ! चुनाव के मौसम में कोई आता है और हमारे चरणों में गिर जाता है। मुझे नहीं पहचाना मैं चुनाव का उम्मीदवार। होनेवाला एम.पी.। मुझे नहीं पहचाना ? आप प्रजातंत्र की गंगा में डुबकी लगाते हैं। बाहर निकलने पर आप देखते हैं कि वह शख्स जो कल आपके चरण छूता था, आपका वोट लेकर गायब हो गया। वोटों की पूरी पेटी लेकर भाग गया।

समस्याओं के घाट पर हम तौलिया लपेटे खड़े हैं। सबसे पूछ रहे हैं-क्यों साहब, वह कहीं आपको नज़र आया ? अरे वही, जिसके हम वोटर हैं। वही, जिसके हम मामा हैं।

पांच साल इसी तरह तौलिया लपेटे, घाट पर खड़े बीत जाते हैं।

-शरद जोशी

कुछ समय पहले राहुल गाँधी भोपाल आकर गए है और ये लिखे जाने तक मोदी जी भी भोपाल में ही होंगे तो अच्छा होगा कि हमारा इस बार का वोट काम के हिसाब से हो।हम एक लोकतांत्रिक देश है , इसलिए हमारा देश बिना सरकार के नहीं चल सकता इसलिए सरकारे तो चुननी ही पड़ेगी पर शायद देश की सत्ता सँभालने वाली पोलिटिकल पार्टीज को काम करने की आदत और जूनून नही हो लेकिन हम अपनी नाप तौल के वोट देने की आदत से सत्ता सँभालने वालो को काम करवाने की आदत डलवा ही सकते और हर चुनाव के साथ सरकार चुने जाने के मापदंड में कुछ फेर बदल कर सकते है ,जो सिर्फ हम ही कर सकते है।

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Neelesh

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